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संवैधानिक आचारसंहिता के आवरण में लिपटी महत्वकांछाए।

Posted On: 13 Aug, 2015 Others में

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दैनिक जागरण के दिनांक 11-8 -15 के सम्पादकीय स्तंभ में श्री राजीव सचान जी का लेख “राहुल – एक विचित्र पहेली ” शीर्षक से प्रकाशित हुआ ।
सारा देश संसद में कार्य ब्योधान से स्तंभित है। देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी के क्रिया कलापों ने भी, सभी देशवासियों को अचंभित कर रखा है। कांग्रेस पार्टी, जो देश को परतंत्रता से मुक्ति दिलाने का श्रेय अपने नाम करती है, जिसने दशकों देश पर एकछत्र राज्य किया है, जिस पार्टी को पटेल जी, नेहरू ,लालबहदुर शास्त्री एवं इंदिरा गांधी जी जैसे तमाम नेताओ का मार्गदर्शन मिला हो, उस की स्थिति ऐसी हो गयी है, की बहुमत तो दूर, गठजोड़ से शासन चलाने की प्रबृति बन चकी है , जिसके परिणाम स्वरुप प्रसंग – 2 के कार्यकाल में तमाम घोटाले एवं प्रशासनिक अनिमिताए, जाँच एजैंसियों द्वारा एवं न्यायलयों के द्वारा प्रकाश में आईं। इस कार्यकाल में राष्ट्रीय सम्पति की भारी लूट मच गयी । परिणामस्वरूप विश्व के समक्छ , इस प्रकरण ने देश की प्रतिष्ठा को अपने निचले स्तर पर ला दिया। अंत्तोगत्वा 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी मात्र 44 सीटो पर सिमट गयी, और स्थित यहाँ तक पहुंच गयी, की पार्टी विपक्छ की भी आधिकारिक भूमिका के मानकों को भी पूरा न कर सकी।
कांग्रेस पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्छ पद श्री मती सोनिया गांधी जी के पास है, पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्क्छ का पद ,सोनिया गांधी जी के एक मात्र पुत्र, श्री राहुल जी के पास है। पार्टी ने पूर्व में ही श्री प्रणव मुखर्जी को देश के राष्ट्रपति पद पर आसीन कराने के निर्णय का एक विशेष उदाहरण पेश कर दिया है। इस प्रकार पार्टी में शीर्ष पदों की योग्यता का मांप दंड, अब शिक्छा, ज्ञान एवं अनुभव के आधार से कहीं ज्यादा, गांधी परिवार का सदस्य होना हो गया। कुछ समय से तमाम संभावनाए दर्शा रही है, की सोनिया जी के नेतृत्व में, राहुल जी को, देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करने की राह में तमाम कांग्रेस पार्टी दृढ़संककल्पित है। कहीं इसी सदर्भ में संसद में वर्तमान ब्योधान राहुल जी के “इन्टरेन्सेशिप “के कारण तो नहीं ? श्री मती सोनिया गांधी जी ने तो, अपने विवाह के दशको बाद एवं तमाम सवालों के बाद ही, भारत वर्ष की नागरिकता स्वीकारी थी। यह भी आश्चर्य का विषय है, की आज तक लगभग 40 से 45 वर्षों के अंतराल में भी, राष्ट्रीय भाषा हिन्दी पर, वे वह नियंत्रण नहीं बना पाई, जो राहुल जी एवं प्रियंका जी का है। काफी हद तक सम्भव है,कि कुछ लोगो के लिए यह विषय कोई माने न रखता हो, किन्तु देश के सामने यह भी एक विषय प्रश्न चिन्ह बना हुआ है।
संसद को चलाना सरकार की जिम्मदारी है। वर्तमान में इस जिम्मदारी को निभाने के लिए, सरकार को क्या करना चाहिए? संसद में स्पीकर के मुख पर पोस्टरो का प्रदर्शन मान्य होना चाहिए, डिप्टी स्पीकर पर कागज के टुकड़े को फेकना मान्य कर लेना चाहिए या फिर विरोधियो के , असंवैधानिक आचरणों की जिद्द के आगे, नतमस्तक हो जाना चाहिए,,लोकसभा स्पीकर के घर के सामने आंशिक वस्त्रों में प्रदर्शन को क्या लोकतान्त्रिक एवं संवेधानिक विरोध की श्रेणी में मान्यता दे देनी चाहिए। सरकार द्वारा विषयो पर चर्चा के अनुरोध को ठुकरा कर, अपने हटधर्मिता पर कायम रहते हुए, संसद में अराजकता के माहोल को मान्यता दे देनी चाहिए। वर्षा कालीन सत्र के निष्प्रयोजन चले जाने से देश को हुई हानि, की भरपाई कैसे होगी? इस विनाश लीला से देश कितना पिछड़ गया, इस का अनुमान क्या कांग्रेसियों को है। बच्चों की तरह जिद्द करके हमने देश के सर्वोच्च संवेधानिक संस्था को छिन्न – भिन्न करने का प्रयास किया है। परिणामस्वरुप देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर आज लोगो ने प्रश्न उठाने शुरू कर दिए है।
लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संसद चलाने की जितनी जिम्मदारी सरकार की होती है,ठीक उतनी ही, जिम्मेदारी विपक्छ की भी होती है, उस प्रयास में सहयोग की। विपक्छ का मुख्य उदेश्य होता है, सरकार पर अंकुश रखने का, और इस कार्य के लिए संविधान में पूरी – पूरी व्यवस्था की गयी है। वर्तमान में, विपक्छ की सहमति के बिना, कोई भी विषय पास नही हो सकता है । संसद में कोई भी विषय, पक्छ – विपक्छ के सार्थक तर्कों से ही अपना अस्तित्व बना सकता है, और इस के लिए गंभीर और तार्किक चर्चा की आवश्यकता होती है। अंत में मतविभाजन के परिणाम स्वरुप ही कानून अपना स्वरुप लेता है। इस पूरी प्रक्रिया में अराजकता के माहोल का तो कोई स्थान है ही नहीं । संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही का दूरदर्शन पर नियमित प्रसारण होता है, जिसे देश और दुनिया पूरी तन्मयता से देखती है। हमारे किसी भी अमर्यादित एवं असंसदीय व्यौहार का प्रभाव देश दुनिया को प्रभावित करता है, और इस के अच्छे बुरे परिणामों से देश को प्रभावित होना पड़ता है। शायद वर्तमान में हुए संसद के क्रिया कलापो से प्रभावित हो कर, जो लोग भारत में निवेश की संभावनाओं से प्रभावित थे, उन्हें इस विषय पर शायद पुनः – विचार न करना पड जाय , जो देश के लिए भारी शर्मिंदगी का काऱण हो सकता है।
हम ज्यों ही चुन कर विधान सभा, संसद या फिर किसी भी संवैधानिक पद प्राप्त करते है, हम आम जन से विशिष्ट श्रेणी में आ जाते है। मेरा तात्पर्य यँहा राज सुख ,बांग्ला गाड़ी से नहीं, अपितु हमारी पूरी – पूरी जिम्मदारी, हमारे उस संवैधानिक पद के प्रति हो जाती है। हम सपथ लेते है, हमारा जीवन अब से देश एवं समाज को समर्पित हो जाता है। अर्थात हमारा सर्वोपरि उद्देश्य रास्ट्र हित हो जाता है। रास्ट्र सम्मान,रास्ट्र हित के सामने, हम और हमारा अहम्, गौड़ हो जाता है। हम बाध्य हो जाते है, राष्ट्रहित के सामने ,अपनी आकांछाओं और अहम की तिलांजली देने के लिए। हमारी विशिष्ठता का आवरण अब संवैधानिक आचार संहिता बन जाती है। इस प्रकार हमारे आचार – विचार से यदि किंचित मात्र भी राष्ट्र का अहित होता है, तो हमें उस विशिष्ट पद पर बने रहने का लेश मात्र भी अधिकार नहीं, क्यों की देश को हुए इस नुकशान का प्रभाव देश की 125 करोड़ जनता को भुगतना है,और विश्व में जो राष्ट्रीय छवि का नुकशान होता है, वह अलग। इस प्रकार के नुकशान की भरपाई कभी भी कोई भी नहीं कर सकता और देश वर्षो वर्ष पीछे चला जाता है ।

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